रफ़तार इतनी तेज़ थी सैलाब-ए-दर्द कीआँखों के बाँध तोड़ के आँसू निकल पड़ेफिर भी न आफ़ताब की गैरत को आया होशतारीकियाँ मिटाने को जुगनू निकल पड़े— Qambar Naqvi