मिरी तो दर्द भी आख़िर दवा तक तो गई होगी
बिना बोले मिरी बोली हवा तक तो गई होगी
यहाँ मजबूर हूँ मैं एक नज़र बस देखने के लिए
मिरी आवाज़ भी हाजत-रवा तक तो गई होगी
भले बरसात हो कितनी ज़मीं बंजर की बंजर है
ज़मीं की दर्द भी अब बे-नवा तक तो गई होगी
नहीं पहचानता कोई भले मुझको यहाँ पे अब
मगर पहचान मेरी हमनवा तक तो गई होगी
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