हवा देती है ज़ालिम ज़ख़्म पर मरहम नहीं होती

ये दुनिया ग़म बढ़ाती है शरीक-ए-ग़म नहीं होती

मेरे माँ बाप ख़ुश होते हैं मेरे मुस्कुराने से
मगर अफ़सोस ये बरसात भी पैहम नहीं होती

मुझे वो छोड़ कर जाती नहीं तो क्या नहीं होता
बस अलमारी में उस की याद की अल्बम नहीं होती

उसे बाहों में भर लेता हूँ मैं अपनी अचानक से
सो मेरे यार की धड़कन कभी मद्धम नहीं होती

बिछड़ जाएँ तो दिल वालो की चाहत और बढ़ती है
किसी सूरत ख़ुदाओं की इबादत कम नहीं होती

ज़माने भर में अपना इश्क़ था मशहूर लेकिन अब
वो पायल तो पहनती है मगर छम छम नहीं होती

— Rohit tewatia 'Ishq'

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Aarzoo Shayari

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