आँखें वो बेनक़ाब जो देखीं हिजाब में
लिख दो गुनाह-ए-इश्क़ हमारे हिसाब में
थोड़ा ग़ुरूर फ़र्ज़ है उनके रुआब में
ख़ुशबू के संग आए हैं काँटे गुलाब में
ख़्वाबों तलक ही बस वो मुयस्सर रहा मुझे
छूता रहा हूँ चाँद को दरिया की आब में
ख़ुद के ख़याल से ही उसे इश्क़ हो गया
मजनूँ को दिख गई थी हक़ीक़त सराब में
सागर ये जानता है मुक़द्दर विसाल का
फिर भी ख़ुशी से खिंच रहा है माहताब में
मायूस हो के जब भी मैं पन्ने पलटता हूँ
अच्छा लगे है फूल का आना किताब में
— Dr Faisal siddiqui















