हसरत-ए-वस्ल की है ख़ू मुझ को
देख कैसी है आरज़ू मुझ को
इश्क़ को तुम हराम कहते हो
है तुम्हारा हलाल थू मुझ को
क्यूँ बदन तेरा दरमियाँ आए
उस तरफ़ की है जुस्तजू मुझ को
बैठे हैं हम जो रूबरू चुप चाप
ये ख़मोशी है गुफ़्तुगू मुझ को
तेरी आँखों के पीछे जो तू है
वो बहुत ही है ख़ूब-रू मुझ को
— Dr Faisal siddiqui















