ik uski hañsi aur adaaon ki dhun | इक उसकी हँसी और अदाओं की धुन

  - Siddharth Saaz

इक उसकी हँसी और अदाओं की धुन
बदल दे रही है हवाओं की धुन

ये तूने ही खोलीं हैं ज़ुल्फें या फिर
किसी ने बजाई है छाँव की धुन

इन्हें गर तू रख दे मिरे सीने पर
तो धड़कन सुनाएगी पाँव की धुन

सुनाती है जिस धुन में माँ लोरियाँ
कुछ ऐसी ही होगी ख़ुदाओं की धुन

मिरे कानों में अब भी मौजूद हैं
वो होंठो से निकली दुआओं की धुन

मुहब्बत के सुर तुझ से रूठे हैं 'साज़'
न बजती थी तुझ से वफ़ाओं की धुन

  - Siddharth Saaz

Khushi Shayari

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