रख रहे हैं इस लिए मरहम अलग
और ज़ख़्मों से है उस का ग़म अलग
उस के हाल-ए-दिल से है सब धूप छाँव
उस से होते ही नहीं मौसम अलग
वो ही चेहरे आँख तक आते हैं अब
वो ही जो होते हैं उस से कम अलग
आप के होंठों पे इक दुनिया नई
आप की आँखों में दो-आलम अलग
दिल परीशाँ था तुम्हारे हिज्र से
आँख भी होने को है अब नम अलग
दिल भुलाने ही नहीं देता तुम्हें
कैसे हो पाएँगे ऐसे हम अलग
— Siddharth Saaz















