कहीं खुला आसमाँ कहीं भूमि तल नहीं है

मिरी समस्या का अब तो कोई भी हल नहीं है

तिरे ये संकल्प सारे के सारे झूठे होंगे
शपथ कि अँजुरी में जिस की गंगा का जल नहीं है

कभी कभी अपने हाल पे रोना आया है रब
पहेली ये ज़िन्दगी की इतनी सरल नहीं है

हमारे शे'रों में सब के ग़म साझा हो गए हैं
मगर ये उस्ताद बोले अच्छी ग़ज़ल नहीं है

कि जाहिलों से बड़ी अदब से मैं पेश आया
ग़लत सुना है मिरा ये तर्ज़ ए अमल नहीं है

— Sachin Sharma

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Mehman Shayari

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