वो जब अपनी किताब लिक्खेगा
मुझ को शायद गुलाब लिक्खेगा
थोड़े से अपने ख़्वाब लिक्खेगा
फिर मुझे ख़्वाब ख़्वाब लिक्खेगा
यादें मेरी जमा करेगा सब
फिर कोई इंतिख़ाब लिक्खेगा
रास्ते में जो शाम होगी तो
वो नया आफ़ताब लिक्खेगा
क्या कहा भूल जाएगा मुझ को
देख लेना जनाब लिक्खेगा
मेरी आँखों को याद करता है
ज़ाहिरन वो शराब लिक्खेगा
है 'सलिल' मेरा मुन्तज़िर अब भी
वो मुझे बे-हिसाब लिक्खेगा
— Surendra Bhatia "Salil"















