क़िस्से सुना रहा हूँ मैं तुम को शबाब के
दिल हो गया था जब क़रीं इक माहताब के
वो जो शरीफ़ है तो है दुनिया के सामने
अरमाँ मचल रहें हैं मगर उस गुलाब के
ख़ुशबू गुलों की और कहीं हो रहीं फ़ना
हक़दार चूमता रहा पन्ने किताब के
कितनी मशक़्क़तें हैं सितारों से पूछिए
रौशन जो हो रहे हैं बिना आफ़ताब के
— Sandeep kushwaha















