आज तन्हा उदास बैठा हूँफिर तिरे आस-पास बैठा हूँतू कहीं ये कफ़न भी छीन न लेइस लिए बे-लिबास बैठा हूँक्या पता कब ख़ुशी से चौंक पड़ूँआदतन बद-हवा से बैठा हूँआरज़ू है कोई इधर आएकब से चौखट के पास बैठा हूँज़िंदगी कश्मकश सही फिर भीले के जीने की आस बैठा हूँ— Sanjay Bhat