कोई इस ओर अगर शौक़ से आया होता
राह में हम ने चराग़ों को जलाया होता
हर नज़र दूर से कहती है चले भी आओ
सिर्फ़ तुम ने ही इशारे से बुलाया होता
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाने से
लुत्फ़ हर वक़्त का तू ने तो उठाया होता
टूटता हूँ जो ज़रा सा तो बिखर जाता हूँ
काश पत्थर से मेरा जिस्म बनाया होता
फूल खिलते ही लरज़ता है तिरे काँटे से
फूल पर ऐसे मुहाफ़िज़ का न साया होता
— Sanjay Bhat















