इसी रस्ते से मैं अक्सर गुज़रता हूँमैं जो गिरता हूँ तो फिर से उभरता हूँयही तरतीब क्यूँ जारी है सदियों सेसवेरे जी उठूँ तो शब को मरता हूँ— Sanjay Bhat