वहाँ से आ के यहाँ आलम-ए-ख़राब में हूँ
किसी अज़ाब से छूटा तो फिर अज़ाब में हूँ
कहा है किस ने कि ख़ुशबू नहीं है काँटों में
नहीं ये बात नहीं है कि बस गुलाब में हूँ
वो तिश्नगी है जो बुझती नहीं बुझाने से
उजाड़ सा कोई मंज़र हूँ और सराब में हूँ
मैं ज़िंदगी हूँ मैं बहती रही हूँ सदियों से
बदन की साँस में हूँ चश्म-ए-नम के आब में हूँ
कसक हूँ ज़ेहन से इंसान के उतरती नहीं
कभी ख़याल में हूँ तो कभी शराब में हूँ
नज़र बचा के कोई पास से गया तो क्या
नहीं नज़र में अगर उस के इज़्तिराब में हूँ
— Sanjay Bhat















