अदना सा पैग़ाम है मेरा सभी के वास्ते
ज़िंदगी होती नहीं है ख़ुदकुशी के वास्ते
शे'र लिखने बैठता हूँ ऐसा लगता है मुझे
जैसे मैं पैदा हुआ हूँ शायरी के वास्ते
ज़िंदगी इक क़ीमती तोहफ़ा बस ये सोचकर
ज़िंदगी मैंने लुटा दी ज़िंदगी के वास्ते
क़ैस ये हर रोज़ समझाता है आकर ख़्वाब में
'इश्क़ अच्छी शय नहीं है हर किसी के वास्ते
जब अँधेरा 'इश्क़ की बस्ती में हर सू हो गया
हमने तब दिल को जलाया रौशनी के वास्ते
सोचता हूँ जब कभी दिल रोने लगता है शजर
मैंने कितने ग़म उठाए इक ख़ुशी के वास्ते
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