दो चार दिल नहीं हैं नहीं हैं हज़ार दिल
इस हुस्न पर फ़िदा हैं तिरे बे शुमार दिल
कैसे क़रार पाए भला बे क़रार दिल
लेता है सिर्फ़ नाम तिरा बार बार दिल
ये हुस्न वाले हुस्न पे अपने नज़र करें
करने लगा है हुस्न को अब दर किनार दिल
पलकें बिछा के बरसों से उलफ़त की राह पर
करता है सुब्ह-ओ-शाम तिरा इंतिज़ार दिल
फ़रहाद की तरह तो कभी क़ैस की तरह
होता फिरे है हुस्न की बस्ती में ख़्वार दिल
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