दोस्तों तारीख़ अपने आपको दोहराएगी
मात दोबारा मुहब्बत से ये नफ़रत पाएगी
इतना मत इतरा तू हाकिम अपने तख़्त-ओ-ताज पर
बादशाही तेरी इक दिन ख़ाक में मिल जाएगी
सिख मुसलमाँ पारसी नसरानी हिन्दू भाई हैं
सर ज़मीन-ए-हिन्द से हर पल सदा ये आएगी
सब फ़ना हो जाएँगे दुश्मन ये अम्न-ओ-चैन के
मुल्क में अम्न-ओ-अमाँ इंसानियत रह जाएगी
ख़ूँ बहाने वाले तू मज़लूम का ये जान ले
ख़ून से मज़लूम की तारीख़ लिक्खी जाएगी
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