हावी है हर बशर पे सियासत इधर उधर
फैली है यूँँ जहान में नफ़रत इधर उधर
फ़ुर्क़त की आग ने ये सितम मुझ पे कर दिया
उड़ते हैं राख बन के मिरे ख़त इधर उधर
हम हँसते हँसते 'इश्क़ की मंज़िल पे आ गए
सर को पटकती रह गई ज़ुल्मत इधर उधर
ठुकरा दिया था जिसने मुझे हँस के देखिए
अब ढूॅंढ़ता है वो मेरी तुर्बत इधर उधर
रब जाने क्या हुआ है परेशाँ हैं हम शजर
दिखती है हमको आपकी सूरत इधर उधर
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