जिस दिन से यहाँ यार वो मेहमान हुआ है
उस दिन से ये ज़िंदान गुलिस्तान हुआ है
ये दिल नहीं टूटा है महज़ आज हमारा
सुन खाना ए काबा का ये अपमान हुआ है
जो हक के परस्तार हैं सर काट दो उनके
ये आज मेरे शहर में ऐलान हुआ है
दिल भी गया नींदें भी गई चैन ओ सुकूँ भी
इस 'इश्क़ में मुझको बड़ा नुकसान हुआ है
थीं रंजिशे जिस घर से पुरानी उसी घर का
एक शख़्स शजर आज मेरी जान हुआ है
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