khaanvaade ka sadaa apne bharam rakkhenge | ख़ानवादे का सदा अपने भरम रक्खेंगे

  - Shajar Abbas

ख़ानवादे का सदा अपने भरम रक्खेंगे
जैसे अजदाद ने रक्खा यूँँ ही हम रक्खेंगे

तुम मुझे चाहते थे चाहते हो चाहोगे
बात है झूठ मगर हम ये भरम रक्खेंगे

होगा उस रोज़ मयस्सर हमें जन्नत का मज़ा
कूचा-ए-यार में जिस रोज़ क़दम रक्खेंगे

मेरी नम आँखें अगर तुमको ख़ुशी देती हैं
आज से वा'दा है हम आँखों को नम रक्खेंगे

हाथ कट जाएँगे तामीर मुकम्मल कर के
इसलिए थोड़ा सा तामीर में ख़म रक्खेंगे

बर्छियाँ रक्खो या भाले ये तुम्हारी मर्ज़ी
हम तो बस अपने मकानों में अलम रक्खेंगे

हम शजर अपने फ़रीज़े को निभाएँगे सदा
हर मुसाफ़िर पे सुनो रहम-ओ-करम रक्खेंगे

  - Shajar Abbas

Jhooth Shayari

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