meri sohbat men dhalne waale log | मेरी सोहबत में ढलने वाले लोग

  - Shajar Abbas

मेरी सोहबत में ढलने वाले लोग
निकलें घर से निकलने वाले लोग
'इश्क़ का लेके हम चले परचम
ख़ूब मचले मचलने वाले लोग

थे ख़सारे में हैं ख़सारे में
राह-ए-बातिल पे चलने वाले लोग

चाहिए दिल तो चाहिए हमको
हम नहीं यूँँ बहलने वाले लोग

सोचता हूँ मैं कैसे ज़िन्दा हैं
ज़हर मुँह से उगलने वाले लोग

मैं ख़ुदा से दुआ ये करता हूँ
ख़ुश रहें मुझसे जलने वाले लोग

कर रहे हैं मुख़ालिफ़त मेरी
मेरे टुकड़ों पे पलने वाले लोग

हाँ शजर सब के सब मुनाफ़िक़ हैं
रंग अपना बदलने वाले लोग

  - Shajar Abbas

Diversity Shayari

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