मिले जो वक़्त तो वा'दा निभाने आ जाना
मेरे मज़ार पे शम्मा जलाने आ जाना
सितम गराँ तू सितम मुझपे ढाने आ जाना
ऐ मेरे दुश्मन-ए-जाँ दिल दुखाने आ जाना
कहा हुसैन ने कमसिन पिसर से मेरे पिसर
क़ज़ा केे सामने तुम मुस्कुराने आ जाना
मज़ार-ए-क़ल्ब है बरसों से मेरा उजड़ा हुआ
इसे वफ़ा केे पयम्बर बसाने आ जाना
गरीब-ओ-बेकस-ओ-मज़लूम-ओ बे-वतन केे शजर
परेशाँ हाल पे आँसू बहाने आ जाना
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