mita dooñga mohabbat ka nishaan aahista aahista | मिटा दूँगा मोहब्ब्त का निशाँ आहिस्ता आहिस्ता

  - Shajar Abbas

मिटा दूँगा मोहब्ब्त का निशाँ आहिस्ता आहिस्ता
जला दूँगा तेरी सब चिट्ठियाँ आहिस्ता आहिस्ता

मता-ए-जान की आमद अगर इक बार हो जाए
मुनव्वर होगा फिर ये आशियाँ आहिस्ता आहिस्ता

सितारे जिस तरह से चाँद के पहलू में होते हैं
पहनती है वो ऐसे बालियाँ आहिस्ता आहिस्ता

तुम्हारे बाद सब कुम्हला गए हैं गुल गुलिस्ताँ के
और हिजरत कर रही हैं तितलियाँ आहिस्ता आहिस्ता

तराशूँगा मैं जब दस्त-ए-अदब से फूल के तन को
उठेगा ख़ारों के दिल से धुआँ आहिस्ता आहिस्ता

सुनाई दास्तान-ए-ग़म जो मैंने तो वो कह उट्ठे
मियाँ आहिस्ता आहिस्ता मियाँ आहिस्ता आहिस्ता

हमारी शायरी में देखना तुम मीर-ओ-गा़लिब की
नज़र आएंगी तुमको झलकियाँ आहिस्ता आहिस्ता

शजर पर जब समर आ जाएँगे तुम देखना यारों
ये झुक जाएँगी सारी डालियाँ आहिस्ता आहिस्ता

हम इतनी तेज़ कर देगें शजर रफ़्तार कदमों की
कहेंगी चीख़कर ये बेड़ियाँ आहिस्ता आहिस्ता

  - Shajar Abbas

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