sharm o haya ka daal ke tan par libaas gul | शर्म ओ हया का डाल के तन पर लिबास गुल

  - Shajar Abbas

शर्म ओ हया का डाल के तन पर लिबास गुल
रहता है सुब्ह ओ शाम मिरे आस पास गुल

शायद कभी न आएगा मौसम बहार का
होता है सोच सोच के ये बे हिरास गुल

बे ख़ौफ़ हो के चूम मिरी पत्तियाँ तू आज
करता है एक भँवरे से ये इल्तिमास गुल

ये आफ़ताब है न कोई माहताब है
पहलू में हो रहा है मिरी इक़्तिबास गुल

अफ़सुर्दा हाल देख के भँवरे का दफ़अतन
हाए चमन में होने लगा बद हवास गुल

ये मयक़दे सी आँखें तिरी देखने के बाद
बढ़ती ही जा रही है ये होंठों की प्यास गुल

चारों तरफ़ ये ज़िक्र है गुलशन में शाम से
देखा गया है मुझ
में तिरा इनइकास गुल

उसको शरीक कर लूँ मैं अपनी हयात का
मिल जाए गर चमन में कोई हक़ शनास गुल

चश्म ए शजर पर एक क़यामत गुज़र गई
बैठा हुआ चमन में जो देखा उदास गुल

  - Shajar Abbas

Wahshat Shayari

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