वक़्त-ए-आख़िर दर्द-ए-दिल दर्द-ए-जिगर किस से कहूँ
हल्क़ा-ए-अहबाब है सब बे-ख़बर किस से कहूँ
मैं हूँ मेरी मुफ़लिसी है और ये तन्हाई है
अलविदा आख़िर बता वक़्त-ए-सफ़र किससे कहूँ
नौहा ख़्वानी करता हूँ मैं जब फिराक़-ए-यार में
गिर्या करने लगते हैं दीवार-ओ-दर किस से कहूँ
ऐ मेरे महबूब-ए-यज़्दाँ ऐ मेरे महबूब-ए-हक़
सूना लगता है मुझे दिल का नगर किस से कहूँ
गुलशन-ए-आफ़ाक़ से वो ले गया जिस दिन से गुल
बाग़बाँ कुम्हला गई शाख़-ए-शजर किस से कहूँ
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