“वो हसीन शहज़ादी”
वो हसीन शहज़ादी
जो मिरी मुहब्बत थी
उस की याद में खो कर
आँखों से लहू रो कर
नज़्म लिख रहा हूँ मैं
उस के दूर जाने से
जितने ग़म उठाए हैं
जितना दर्द झेला है
आज नज़्म में सारा
दर्द लिख रहा हूँ मैं
वो हसीन शहज़ादी
जिस का मेरी ग़ज़लों में
तुम को ज़िक्र मिलता है
जिस के नाम से मेरी
ग़ज़ले नूर पाती हैं
वो हसीन शहज़ादी
जो मिरी मुहब्बत थी
उस ने चंद दिन पहले
इस हक़ीर दुनिया से
दोस्तों विदा ले कर
दूसरे ही दुनिया में
घर बसा लिया अपना
वो हसीन शहज़ादी
जो मिरी मुहब्बत थी
उस ने इस ज़माने से
जिस घड़ी विदा ली थी
सिर्फ़ बीस साला थी
आओ उस के बारे में
आज नज़्म के ज़रिए
मैं तुम्हें सराहत से
सारे ग़म सुनाता हूँ
उस का ख़ाल-ओ-ख़द क्या था
मैं तुम्हें बताता हूँ
उस ने इस ज़माने से
जाते वक़्त जितनी भी
चीज़े मुझ को सौंपी थीं
सब तुम्हें दिखाता हूँ
आओ साथ में आओ
वो वहाँ जो चुप चुप सी
इक बड़ी सी बस्ती है
हम वहाँ पे चलते हैं
वो वहाँ जो कोने में
तीन चार टीले हैं
उस
में एक छोटा सा
जो उदास टीला है
उस की इस ज़माने में
आख़िरी निशानी है
उस की इस निशानी को
जाने क्यूँ जहाँ वाले
क़ब्र नाम देते हैं
मैं नहीं समझता हूँ
क़ब्र किस को को कहते हैं
मैं सवाल करता हूँ
तुम से ऐ मिरे भाई
क्या मुझे बताओगे
क़ब्र किस को कहते हैं
इक मिनट रुको भाई
एक चीज़ याद आई
मैं हमेशा जिस दम भी
इस जगह पे आता हूँ
तो हमेशा के जैसे
फूल साथ लाता हूँ
माज़रत मिरे भाई
सिर्फ़ इक मिनट देना
वो वहाँ जो गुलशन हैं
मैं वहाँ पे जाता हूँ
फूल ले के आता हूँ
फिर तुम्हें बताऊँगा
फूल मैं क्यूँ लाया हूँ
हाँ तो अब सुनो भाई
फूल मैं यूँ लाया हूँ
वो वहाँ जो गुलशन हैं
हम वहाँ पे जाते थे
वो हमेशा तोहफ़े में
फूल माँगा करती थी
और तैश से मुझ से
फूल ले के कहती थी
ऐ शजर इधर देखो
मैं जो तुम से कहती हूँ
बात ज़ेहन में रखना
देखो भूल मत जाना
मुझ से मिलने जब आना
फूल साथ में लाना
बस यही सबब है अब
जब यहाँ पे आता हूँ
तो हमेशा गुलशन से
फूल साथ लाता हूँ
फिर मैं अपने हाथों से
फूल रख के टीले पर
अश्कबार होता हूँ
बे-शुमार रोता हूँ
अपनी जान खोता हूँ
आज कल मिरे भाई
मैं बहुत परेशाँ हूँ
किस तरह सुकूँ पाऊँ
कैसे दिल को बहलाऊँ
कैसे ख़ुद को समझाऊँ
सोच कर परेशाँ हूँ
वो हसीन शहज़ादी
जो मिरी मुहब्बत थी
उस के बिन ज़माने में
किस तरह जिऊँगा मैं















