ये तेरे ख़्वाब से जुड़ी हुई है
नींद जो आँख में भरी हुई है
मेरे तो सारे ज़ख़्म ताज़ा हैं
आप की चोट तो सड़ी हुई है
ऐसा क्या काम है तुझे ऐ दोस्त
जाने की जल्दी क्यूँ लगी हुई है
आज भी इंतिज़ार में तेरे
इक घड़ी मेज़ पर पड़ी हुई है
चंद नोटों के नीचे बटवे में
उस की तस्वीर भी रखी हुई है
दिल को पत्थर बना के रक्खा है
ज़िंदगी ठाठ पे अड़ी हुई है
कैसे सर पे चढ़ूॅं मैं दुनिया के
ये तो ख़ुद में बहुत गिरी हुई है
वर्ना वो ऐसा क्यूँ करेगा भला
आज उस ने शराब पी हुई है
कैसे कह दूँ उसे मोहब्बत नइॅं
ग़म-ए-फ़ुर्क़त से वो दुखी हुई है
— Asad Khan















