मेरा आँगन भी महक जाएगा गुलशन बनके
मेरे घर आएगी जिस रोज़ तू दुल्हन बनके
मेरे रग रग में लहू बनके तू बहती जाए
और सीने में तेरे धड़कूं मैं धड़कन बनके
हमको इक दूजे से बांधेगी जो नन्ही सी जान
ज़िंदगी में वो मेरी आएगी बचपन बनके
वो नज़र मुझको न आए तो लगेगी बढ़ने
मेरी सांसें मेरे सीने में ही उलझन बनके
कल को कंधे के बराबर वो मेरे आएगी
जो कभी पीठ पे सो जाएगी छुटकन बनके
बेटे की तरह बुढ़ापे में हमारी बेटी
अपनी पलकों पे रखेगी हमें सरवन बनके
सुन मेरी जान मैं जिस रोज चला जाऊंगा
फिर तेरे हाथों से टूटूंगा मैं कंगन बनके
मुझ सेे पहले ही अगर दुनिया जो तूने छोड़ा
तो मैं रह जाऊंगा इक सूना सा आंगन बनके
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