कोई क्या होगा जहाँ में जिस क़दर पागल हूँ मैं
देख कर तुम कह न पाओगे मगर पागल हूँ मैं
अब बहुत जल्दी ही मैं मशहूर होने वाला हूँ
देखो अब कहने लगी है हर नज़र पागल हूँ मैं
मेरा हुलिया, मेरे कपड़े, मेरी आँखें देखकर
लाज़िमी है होना सबको मुझ सेे डर पागल हूँ मैं
फ़ासले मुझ सेे बढ़ा सकते हो तुम भी शौक़ से
क्या ख़ता मेरी है इस
में अब अगर पागल हूँ मैं
मैं बरी हो जाऊॅंगा हर इक सज़ा से इसलिए
सारे इल्ज़ामात लाके मुझपे धर पागल हूँ मैं
'अक़्ल के अंधे ओ बादल कर रहे हो क्या उधर
बिजली के झटके मुझे दो याँ इधर पागल हूँ मैं
चाह कर भी मैं किसी का हो नहीं सकता हूँ अब
कैसी दुनिया, कैसे अपने, कैसा घर पागल हूँ मैं
कौन माने मेरी अब आज़ाद है तेरी हवस
साथ मेरे जैसा चाहे वैसा कर पागल हूँ मैं
या'नी पूरे होश में अब आ चुका है इसलिए
ख़ुद-ब-ख़ुद बकने लगा है ‘शिव सफ़र’ पागल हूँ मैं
Read Full