इक ख़मोशी की सम्त जाते हुए
कुछ न बोला उसे बुलाते हुए
तुम ने कितनों का दिल दुखाया है
इक दुखे दिल से दिल लगाते हुए
फूल के साथ कोई काँटा भी
चुभने लगता है याद आते हुए
मैं भी इक रोज़ गिर पड़ूँगा यहीं
अपने अस्बाब को उठाते हुए
एक सहरा है ज़िंदगी जिस
में
नक़्श ए पा हैं तमाम जाते हुए
हाथ आते नहीं हैं ख़्वाब मिरे
लग रहे थे जो हाथ आते हुए
— Shivam chaubey















