करेगी ख़ुद-कुशी आख़िर मुहब्बत
अना से अब गई है घिर मुहब्बत
बदन तक का सफ़र भाता है इस को
कुछ इस हद तक गई है गिर मुहब्बत
जिसे चाहे उसी को पूजती है
है कितनी देख लो काफ़िर मुहब्ब्त
पुराने ज़ख़्म भी अब तक नए हैं
मगर दिल चाहता है फिर मुहब्बत
कहीं हम दोस्ती भी खो न बैठें
सो करते ही नहीं ज़ाहिर मुहब्बत
किसी के वास्ते है अमृता तो
किसी के वास्ते साहिर मुहब्बत
— Shruti chhaya















