mujh marte hue 'aashiq ko kuchh yoon bach | मुझ मरते हुए 'आशिक़ को कुछ यूँं बचाना है

  - BR SUDHAKAR

मुझ मरते हुए 'आशिक़ को कुछ यूँं बचाना है
इक बोसा जबीं पर, इक होंठों पे लगाना है

ये सोच भी लेना तुम, गर छोड़ के जाना है
फिर याद न करना है और याद न आना है

ज़ख़्मों को ये सहता है कह कह कह के मुहब्बत है
दिल मेरा या तो पागल है या तो दिवाना है

इक वो है कि चुप होने का नाम नहीं लेता
इक मैं हूँ कि बस मुझ को इक क़िस्सा सुनाना है

दुनिया ही बनाती है नफ़रत भी मुहब्बत भी
ये फ़ैसला तेरा है क्या काम में लाना है

तुम याद को मेरी आंगन में कहीं रख देना
इक नाम का मेरे तुमको दीप जलाना है

ये ज़ख़्म की चारा-साज़ी सच नहीं है उसका
उसने तेरे ज़ख़्मों को नासूर बनाना है

तू मिलने नहीं आयेगी, इस
में नया क्या है
ये कौन सा तेरा पहला पहला बहाना है

जो कहना हो तुम को, मुझ सेे फोन पे कह देना
थोड़ा सा मैं जल्दी में हूँ काम पे जाना है

तुम आस लगाए बैठे, वो भी 'सलीम' उस से
जिसने कभी शायद ही फिर लौट के आना है

  - BR SUDHAKAR

Aasra Shayari

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