सारी दुनिया ही तारों भरी मिलती है
जब किसी दोस्त की दोस्ती मिलती है
आशिक़ों को तो बस ख़ुद-कुशी मिलती है
तू भी सच कहता था वाकई मिलती है
जो मोहब्बत में उसकी गया, वो गया
कहने को है वहाँ ज़िंदगी मिलती है
उसके आने पे कोई चला जाता है
रात ढलती है तब रौशनी मिलती है
ज़िंदगी चाहे जितनी सजा लो मगर
कुछ न कुछ तो हमेशा कमी मिलती है
हम तो सद
में से बाहिर चले आएँगे
पर जो दिल तोड़ते! क्या ख़ुशी मिलती है
ऐसे इक घर में मैं बंद हूँ अब जहाँ
बस कभी ही कभी रोशनी मिलती है
तू मुहब्बत से मेरी मज़ा ले रहा
आशिक़ी में तेरी दिल-लगी मिलती है
शहर में रोशनी तो बहुत है, मगर
एक इक चेहरे पे बेकसी मिलती है
हो गया है ये कानून भी कागज़ी
अब तो सच को कहाँ मुंसफी मिलती है
कुछ नहीं चाहिए फिर मुझे तो 'सलीम'
राजा है वो जिसे शा'इरी मिलती है
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