सारे ख़त तस्वीर जला कर बैठा है
वो सीने में आग लगा कर बैठा है
था जिस पर विश्वास उसे ख़ुद से ज्यादा
आज़ वही इक यार दग़ा कर बैठा है
मालूम है वो उसे नकारेगी इक दिन
फिर भी उस सेे 'इश्क़ लड़ा कर बैठा है
मुश्किल को आसाँ करने के चक्कर में
अपनी मुश्किल स्वयं बढ़ा कर बैठा है
कोस रहा है बस क़िस्मत को बेचारा
वो ख़ुद घर पर खाट बिछा कर बैठा है
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