बे-सबब मुस्कुराना ज़रूरी नहीं

इस तरह ग़म छुपाना ज़रूरी नहीं

आँख में गर समुन्दर बनें तो बनें
आँसुओं को बहाना ज़रूरी नहीं

कौन है जो तुम्हारी कहानी सुने
ग़म सभी को दिखाना ज़रूरी नहीं

तुम सफ़र में अकेले चलोगे यहाँ
साथ देगा ज़माना ज़रूरी नहीं

बर्क़ गिरती रहेगी चमन में मगर
ख़ाक हो आशियाना ज़रूरी नहीं

तीर भी अब चलें कुछ नए ढंग से
चूक जाए निशाना ज़रूरी नहीं

हस्ब-ए-मामूल उस ने है वा'दा किया
उस का वा'दा निभाना ज़रूरी नहीं

— Gulshan

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Rahbar Shayari

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