किसी को ज़ार बनना है

किसी को हार बनना है

किसी को आग खानी है
किसे अंगार बनना है

किसी का सुर नहीं लगता
उसे झंकार बनना है

हमारा दिल नहीं लगता
हमें टंकार बनना है

समूचे विश्व के आगे
मुझे ललकार बनना है

मुझे ही आग खानी है
मुझे अंगार बनना है

लहू से खेलने वाली
मुझे तलवार बनना है

मुझे भी जीत चखनी है
किसी की हार बनना है

मुझे आकाश छूना है
नहीं बस भार बनना है

मुझे सब वेद पढ़ने हैं
नहीं बेकार बनना है

जगत की इस कथा का अब
मुझे ही सार बनना है

मुझे दुनिया बदलनी है
मुझे औजार बनना है

नहीं मानव मुझे रहना
मुझे अवतार बनना है

— Vishakt ki Kalam se

More by Vishakt ki Kalam se

Other ghazal from the same pen

See all from Vishakt ki Kalam se →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling