"मेरे अपने "

किसी की बात को ले कर कहीं से
हमें क्यूँ मार दी ठोकर वहीं से

लगे वो तीर के जैसे कहीं पर
दिए कुछ घाव गहरे दिख रहे थे

हमें मालूम नहीं था ज़हर होगा
किसी की जान थे जो छिप रहे थे

अगर कहते हमें वो सामने से
परेशानी नहीं होती किसी से

मगर वो थे हमारे ख़ास भी तो
वहीं अब तक मिरे मालिक रहे थे

सहज समझें नहीं वो भाव मेरे
न मेरे घाव उन को दिख रहे थे

— Vishakt ki Kalam se

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