अकेली एक तितली पड़ रही है
सभी फूलों पे भारी पड़ रही है
नज़र तो है सभी की द्रोपदी पर
पर उन के बीच मछली पड़ रही है
बदन बीमार होता जा रहा है
चलो ज़ंजीर ढीली पड़ रही है
सुनानी हैं ग़ज़ल दस को कहीं पर
उसी दिन उस की शादी पड़ रही है
फलों तक तो पहुँच सकता हूँ मैं भी
शजर की डाल कच्ची पड़ रही है
मुहब्बत मर रही है जान मेरी
तिरी पाजेब नीली पड़ रही है
ख़यालों ने जगह कुछ और माँगी
मगर ये बहर छोटी पड़ रही है
— Vishnu virat















