मोहब्बत में जिस के जुदाई नहीं है

मेरे दिल से उस की रिहाई नहीं है

मेरे इश्क़ में इश्क़ है या नहीं पर
मेरे इश्क़ में बे-वफ़ाई नहीं है

लगा हूँ जिसे ख़ुश में करने में कब से
उसे तो ज़रा आशनाई नहीं है

तुम्हें नींद मख़मल पे आती हो लेकिन
मेरे घर तो इक चारपाई नहीं है

बहुत ग़म में गुज़री है तेरी जुदाई
मगर मेरी जैसी जुदाई नहीं है

बहुत बादशाही के क़िस्से सुना पर
उमर जैसी अब बादशाही नहीं है

शब-ए-क़द्र में तुम इबादत करो बस
शब-ए-क़द्र है रत-जगाई नहीं है

— Waseem Siddharthnagari

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