aise tu meraa sabr aazmaaya mat kar | ऐसे तू मेरा सब्र आज़माया मत कर

  - ALI ZUHRI

ऐसे तू मेरा सब्र आज़माया मत कर
यूँँ बात बात पे अब मुझे सताया मत कर

यह सारे नख़रे वख़रे कैसे है तेरे
जब रूठना हो तो बिस्तर पर आया मत कर

अच्छा सुन मेरा एक मशवरा है तुझको
खोना जिसको हो उसको पाया मत कर

वो कहता है शादी भी कर लूँगा तुम सेे
बस तू कपड़े उतारते घबराया मत कर

तुम दुनिया हो मेरी जाने जाँ भी हो तुम
झूठे वादो से तो मुझे रिझाया मत कर

तेरी महबूबा हूँ यह बात ठीक लेकिन
फिर भी मुझको ऐसे हाथ लगाया मत कर

  - ALI ZUHRI

Sabr Shayari

Our suggestion based on your choice

More by ALI ZUHRI

As you were reading Shayari by ALI ZUHRI

Similar Writers

our suggestion based on ALI ZUHRI

Similar Moods

As you were reading Sabr Shayari Shayari