"मेरा गाँव"
वो गाँव, वो नुक्कड़ मैं छोड़कर चला आया
मैं ख़ुद ही अपना घर तोड़कर चला आया
जिस
में निहारता था अपनी सुरत मैं
वो सूना मेरा दर्पण होगा
जहाँ ठहाके लगते थे हर शाम
वो तन्हा मेरा आँगन होगा
उन दर-ओ-दीवारों से मुँह मोड़कर चला आया
बेचारा मेरी राह देख ख़ुद को तन्हा पाता होगा
मेरा वो तालाब, अब वहाँ कौन जाता होगा
ऊब गई होंगी वो हवाएँ जिन से मैं बतलाता था
मुझ सेा पागल कौन भला हो
जो अपने दुखड़े उन्हे सुनाता होगा
तन पर उन की यादें मैं ओढ़कर चला आया
— Vikas Sangam















