"शिकश्त"
जहाँ बल पड़ते हैं सोच के, वहाँ सुकूँ क्या लिखें
अपने शिकश्त-ए-आलम का, हम जुनूँ क्या लिखे
शिकश्त ही सही, शिकश्त से मोहब्बत कर ली हम ने
विजय प्रिय नहीं हमें, विजय से बग़ावत कर ली हम ने
जहाँ फूटते हैं अँगारे जिस्मों में, वहाँ लहू क्या लिखें
अपने शिकश्त-ए-आलम का, हम जुनूँ क्या लिखें
— Vikas Sangam















