अगरचे थे तो दोनों ही ग़लत अल्लाह जाने है
मगर बस इक ने क्यूँ की माज़रत अल्लाह जाने है
करे है पाक ज़ाहिर को कि दुनिया तुझ को समझे नेक
मियाँ बातिन का क्या जिस को फ़क़त अल्लाह जाने है
अगर तनक़ीद करती है तिरे किरदार पर दुनिया
न हो मायूस तेरी असलियत अल्लाह जाने है
बशर तो फ़ितरतन माने है मुश्किल को अज़ाब अपना
पर उस मुश्किल में जो है आफ़ियत अल्लाह जाने है
न हो ग़म बाँटने को कोई गर तो मुतमइन यूँ रह
कि है अल्लाह और हर कैफ़ियत अल्लाह जाने है
तू इतना सोच मत मंज़िल को आग़ाज़-ए-सफ़र में ही
तू बस चल पड़ कि रस्ते अन-गिनत अल्लाह जाने है
यहाँ हर शख़्स ख़ुद को लाइक़-ए-बख़्शिश समझता है
मगर सँवरेगी किस की आख़िरत अल्लाह जाने है
नहीं था बे-सबब उस शख़्स का तुझ से बिछड़ना 'ज़ान'
नहीं थी उस को तेरी अहमियत अल्लाह जाने है















