"पहला इश्क़"
तअर्रुफ़ हुआ था अभी ही उन से
वक़्त कहाँ ज़्यादा गुज़रा है
बातें होती थी बहुत ही उन से
वक़्त कहाँ ज़्यादा सुधरा है
अंकों में दिलचस्पी मुझे
उर्दू का थोड़ा-सा ज्ञान था
वो अंग्रेज़ी से वाक़िफ़ बहुत
लेकिन शून्य सा अभिमान था
पसंद उन की आँखों में काजल
और उन पर वो चश्मा था
उन्हें पसंद मेरी घनी दाढ़ी
और आँखों में सुरमा था
कभी ये ला दो तो कभी वो ला दो
मैं ने की हर ख़्वाहिश पूरी
लेकिन महरम बनाने की
मेरी ख़्वाहिश रह गई अधूरी
कहा था उन्होंने पहले ही मुझ से
रख दो अपने माँ-बाप को अर्ज़ी
पर ज़फ़र डरता खोने से उन को
और कहा जैसी रब की मर्ज़ी
न जाने कौन सा लज़ीज़ वक़्त था
की इश्क़ की रसोई को हम ने पकाया
अगर अलाहिदा करना ही था मक़्सद
तो फिर क्यूँ हम दोनों को मिलाया















