बहता लहू मोहब्बत का हम जमा चुके थे
हम उन से दूरी रफ़्ता-रफ़्ता बना चुके थे
दर पर ही रोकने का जब तक ख़याल आया
बाहर वो लांँघकर तो दहलीज़ जा चुके थे
हर ज़ख़्म को छिपाकर जीते ख़ुशी ख़ुशी हम
दुख तब हुआ नज़र उन को ज़ख़्म आ चुके थे
कैसे न बनता पत्थर ये नर्म-दिल हमारा
तस्वीर उन की इस दिल से हम हटा चुके थे
फ़ितरत समझ में आई हम को ज़माने की जब
सब फा़यिदा हमारा तब तक उठा चुके थे
कैसे करे जतन अब पाने का उन को 'आदिव'
क़िस्मत से जो हमारी हम ख़ुद मिटा चुके थे
— Abhay Aadiv















