ज़ाहिर तुझे भी हो जाएगा ये हाल मेरा

बाहर आ जाए जो अंदर का उबाल मेरा

जीना तो ज़िंदगी कर बैठी मुहाल मेरा
फिर भी तू देख जीने का ये कमाल मेरा

मैं चाहता यही था सब चाह ख़त्म हो अब
फिर चाहकर तुम्हें बदला ये ख़याल मेरा

उस ने दिया यूँ होंठो से हर जवाब अपना
होंठो पे ही रहा फिर हर इक सवाल मेरा

शक है तुझे अगर ये अब भी गुदाज़ है दिल
तो सीने से कभी ये पत्थर निकाल मेरा

तू मुझ को मुक्त कर दे इन सारे बंधनों से
ये मोह माया का दे अब तोड़ जाल मेरा

— Abhay Aadiv

More by Abhay Aadiv

Other ghazal from the same pen

See all from Abhay Aadiv →

Khyaal Shayari

Shers of khyaal.

All Khyaal Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling