theek hua jo bik ga.e sainik mutthi bhar deenaaron men | ठीक हुआ जो बिक गए सैनिक मुट्ठी भर दीनारों में

  - Aalok Shrivastav

ठीक हुआ जो बिक गए सैनिक मुट्ठी भर दीनारों में
वैसे भी तो ज़ंग लगा था पुश्तैनी हथियारों में

सर्द नसों में चलते चलते गर्म लहू जब बर्फ़ हुआ
चार पड़ोसी जिस्म उठा कर झोंक आए अँगारों में

खेतों को मुट्ठी में भरना अब तक सीख नहीं पाया
यूँँ तो मेरा जीवन बीता सामंती अय्यारों में

कैसे उस के चाल-चलन में अंग्रेज़ी अंदाज़ न हो
आख़िर उस ने साँसें लीं हैं पच्छिम के दरबारों में

नज़दीकी अक्सर दूरी का कारन भी बन जाती है
सोच-समझ कर घुलना-मिलना अपने रिश्ते-दारों में

चाँद अगर पूरा चमके तो उस के दाग़ खटकते हैं
एक न एक बुराई तय है सारे इज़्ज़त-दारों में

  - Aalok Shrivastav

Sach Shayari

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