रहो तुम भी यूँँ जैसे ग़म रहा है
मोहब्बत का यही आलम रहा है
यहाँ खिलता नहीं है फूल कोई
यहाँ मौसम भी बे-मौसम रहा है
तुम्हें क्या याद है वो पल हमारे
यही शिकवा मुझे हर दम रहा है
ये काग़ज़ पे बिखरते लफ़्ज़ देखो
पिघलते अश्क में ख़ूँ जम रहा है
कहीं कोई मेरे जैसा भी 'आमिर'
ख़ुदा की क़ैद में आदम रहा है
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