“ज़ोल्पिडेम”
नींद की गोलियाँ
डिब्बे से ऐसे ग़ाएब थीं
जैसे किसी कहानी से
अंत चुप-चाप उठकर चला गया हो
मैं
रात भर
एक आदमी चलित रिक्शा खींच रहा था
और एक ख़याल
भारी सवारी बन कर बैठा हुआ था
— Aatish Indori
नींद की गोलियाँ
डिब्बे से ऐसे ग़ाएब थीं
जैसे किसी कहानी से
अंत चुप-चाप उठकर चला गया हो
मैं
रात भर
एक आदमी चलित रिक्शा खींच रहा था
और एक ख़याल
भारी सवारी बन कर बैठा हुआ था
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