वक़्त की अपनी घड़ी थी जानता था
रेल इक दिन चल पड़ेगी जानता था
उस अकेलेपन को मैं ने ज़िन्दगी दी
जो अकेलापन उदासी जानता था
इस लिए भी था सुकूँ दुश्वार मुझ को
मैं पिता जी की कहानी जानता था
मैं अगर मर जाऊँ तो इतना ही लिखना
एक दरिया था, रवानी जानता था
वक़्त लेना ख़ुद-कुशी ईजाद करना
मैं ख़ुदा की होशियारी जानता था
शख़्स वो भी बिन लबों के मर गया है
जो गुलों की बाग़बानी जानता था
— Abhishar Geeta Shukla















