वक़्त की अपनी घड़ी थी जानता था
रेल इक दिन चल पड़ेगी जानता था
उस अकेलेपन को मैंने ज़िन्दगी दी
जो अकेलापन उदासी जानता था
इसलिए भी था सुकूँ दुश्वार मुझको
मैं पिता जी की कहानी जानता था
मैं अगर मर जाऊँ तो इतना ही लिखना
एक दरिया था, रवानी जानता था
वक़्त लेना ख़ुदकुशी ईजाद करना
मैं ख़ुदा की होशियारी जानता था
शख़्स वो भी बिन लबों के मर गया है
जो गुलों की बाग़बानी जानता था
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